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क्या तारें सच में टुटते हैं?
बचपन के उन दिनों को याद किजीऐ जब हम किताबो मोर पंख रख कर विध्या आने का दावा करते थें, सिक्के को रेल के नीचे रख उसकी चुम्बक बन जायेगी और पेन्सिल के छिल्लको को दुध के साथ मिलाने से रबड ( ईरेजर) बन जायेगी और ना जाने कौन कौन सी सोच को लेकर हम बच्चे से बडे हो गये आधिकतर चीजे समय के साथ समझ आ गई
लेकिन एक और जादुई बात थी जो हम बचपन में देखा करते है और हम में से आधिकतर ने उसे किया भी होगा और वो है टूटते तारे से विश मागँना ,
शायद आज भी कई लोग इस बात को एक तन्त्र विध्या समझते हैं की फटा फट अपनी विश पुरी करने का सबसे सस्ता ,टिकाऊ और आसान तरीका, ,, अब ये तो मैं नही जानती की कितनो कि विश ऐसे पुरी हुई और कितनो को अभी भी टुटते तारे का इन्तजार हैं लेकिन हाँ ये तीन सावलो के जवाब जो मैं लिख रही हुँ उन लोगो के बहुत काम आयेगें जो अपनी विश पुरी करने के लिऐ किसी टुटते तारे कि तलाश में है
तारे क्यों टुटते हैं और वो विश कैसे पुरी करते हैं?
हो सकता हैं आपको छटका लगें लेकिन जिन्है आप टुटता तारा समझ कर ज्ल्दी से अपनी विश कि लिस्ट खोल कर रख देते हो वो तारे नही बल्कि अंतरिक्ष में घुम रही चाट्टाने होती है जो धरती की और खीचीं चली आती है
धरती के खीचाव की वजह से......अब कम से कम एक चट्टान का टुकडा तो किसी कि विश पुरी नही कर सकता....तो वो चमकता क्यों हैं? वो इस लिऐ नही चकता कि तुम उसे टुटता तारा समझ सको बल्कि वो इस लिऐ चमकता हैं कि धरती के आसमान में जब वो आता है तो उसकी स्पीड हजारो किमी/घण्टा होती है और उस गाती पर हवा के कणो के रगड से वो जल उठता हैं मतलब कि जिसे तुम तुटता तारा समझते हो वो असल में एक आग में सुलगता हुआ और तेज गाति से चलता हुआ एक चट्टान का टुकडा है इस से ज्यादा कुछ नही
अगर उस जगह में तुम्हे भी उस गति से फेंकु तो तुम भी धरती पर खडे इन्सान को टुटता तारा मालुम होंगें, , ये अलग बात है कि तुम्हारी हड्डिया भी ढुढें नही मिलेगी
तो ये चट्टान ऊपर आसमान में क्या कर रही हैं?
सही बात हैं आखिर चट्टाने ऊपर क्या करने गई , भोलुराम ये दुनिया सिर्फ धरती तक ही सिमीत नही हैं और भी बहुत कुछ हैं इसमें।
जब से हमारा सोलर सिस्टम बना तब से लगातार इसमें चेन्ज हुआ और है कभी ज्वालामुखी विस्फोट से या कभी दो ग्रह की टक्कर से ये चट्टाने टुट कर अतंरिक्ष में आ जाती हैं इस समय मंगल (मार्स) और बृहस्पाती (जुपीटर) ग्रह के बीच में बहुत सारी चट्टाने है जिसे कुपर बेल्ट काहा जाता हैं यही से ये छिटक कर हमारे आसमान.में आ जाती हैं और हमे टुटते तारे के रुप में दिखती है और हम दोनो हाथ जोड कर अपनी विश मागतें हैं। इसे कहते है म से मुर्खता
शुक्र मानाओ कि बृहस्पति जैसा ग्रह सोलर सिस्टम में मौजुद है जो इन चट्टानो का एक बडा भाग खुद खा जाता है वरना तो हमारा क्या होता ये तो उन डायनासोर से पुछो जो बस एक चट्टान के धरती से टकराते ही खत्म हो गये
क्या होगा अगर कोई तारा सच में टुट जाये?
तुम्हारी विश तब भी पुरी नही होगी उल्टा तुम खुद भाप बन कर ऊड जाओगे😪😮😥
तो ऐसा तो बिल्कुल मत सोचना ....
ये जो हमे टूटते हुये तारे दिखते है ये धरती से 5 से 30 किमी. दुर होते है अगर इतनी दुरी मे कोई असली तारा सच मे टुट जाये तो हमारी तो बात ही छोडीये साहब ये धरती और धरती के साथ पुरा सोलर सिस्टम भाप बनकर ऊड जायेगा और अगर वो तारा सुपरनोवा विस्फोट के साथ टुटता तो आस पास के चार पाँच सोलर सिस्टम क़ो अलग से डकारेगा.....
तो विश मागंने मैं बडा गभीर संकट है भोलुराम ज्यादा अच्छा होगा कि तुम खुद मेहनत कर के वो विश पुरी कर लो कभी तुम्हारी विश के चक्कर में हम सब को लेने के देने ना पड जाये
👋👋👋👋👋 बाय बाय
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Written by: simmi chauhan
Edited by: simmi chauhan